वर्तमान मानवीय सम्बन्ध
🌹 शुभ प्रभात🌹
,,,,एक बार फिर आपके समक्ष आशू की एक कविता ,,,,,,
जो कि वर्तमान मानवीय वेदनाओं से आहत हमारे ह्रदय के भावों से उत्पन्न हुई,,,
🌸
आज हालात बदतर हुए क्या कहें,
बंद भवनों में आंधी समाने लगी,
डूबे थे लोग जो प्रेम के नीर में,
धर्म की आग उनको जलाने लगी,
🌸
हर जगह हर कोई ठीक था ठीक है,
फिर क्यों आँखे ये आँशु बहाने लगी,
नफ़रतें है भरी जेहनों की कशिश,
बन के काँटा दिलों को दुखाने लगी,
🌸
हर कोई पूंछता दूसरे व्यक्ति से,
आप पर बदलियाँ क्यों ये छाने लगी,
पर कोई झांकता अपने अंदर नहीं ,
खुद की बाहें क्यों दिल को छुपाने लगी,
🌸
हर तरफ गर्दिशें हर तरफ ना नुकर,
सैकड़ों अवगुणों की दुकानें लगी,
कौमें तो आज खुद की ही मक्कारी को,
राजनीती के दामन छुपाने लगी,
🌸
बन के खुदगर्ज अब "आशू"की मन्नतें,
अपने भगवन से आशें लगाने लगी,
हे प्रभु प्रेरणा व सहन शक्ति दो,
ये आग रातों की नींदे उड़ाने लगी,
🌸🌹🌸🌹🌸🌹🙏🙏🙏🙏🙏
----धन्य बाद,, यदि किसी प्रकार की त्रुटि हो तो कृपया अवगत अवश्य कराएं।
आपके सुझावों की प्रतीक्षा में,,,,,,,,,,🌼🌼🌼🌼
आशीष शुक्ल आशु
,,,,एक बार फिर आपके समक्ष आशू की एक कविता ,,,,,,
जो कि वर्तमान मानवीय वेदनाओं से आहत हमारे ह्रदय के भावों से उत्पन्न हुई,,,
🌸
आज हालात बदतर हुए क्या कहें,
बंद भवनों में आंधी समाने लगी,
डूबे थे लोग जो प्रेम के नीर में,
धर्म की आग उनको जलाने लगी,
🌸
हर जगह हर कोई ठीक था ठीक है,
फिर क्यों आँखे ये आँशु बहाने लगी,
नफ़रतें है भरी जेहनों की कशिश,
बन के काँटा दिलों को दुखाने लगी,
🌸
हर कोई पूंछता दूसरे व्यक्ति से,
आप पर बदलियाँ क्यों ये छाने लगी,
पर कोई झांकता अपने अंदर नहीं ,
खुद की बाहें क्यों दिल को छुपाने लगी,
🌸
हर तरफ गर्दिशें हर तरफ ना नुकर,
सैकड़ों अवगुणों की दुकानें लगी,
कौमें तो आज खुद की ही मक्कारी को,
राजनीती के दामन छुपाने लगी,
🌸
बन के खुदगर्ज अब "आशू"की मन्नतें,
अपने भगवन से आशें लगाने लगी,
हे प्रभु प्रेरणा व सहन शक्ति दो,
ये आग रातों की नींदे उड़ाने लगी,
🌸🌹🌸🌹🌸🌹🙏🙏🙏🙏🙏
----धन्य बाद,, यदि किसी प्रकार की त्रुटि हो तो कृपया अवगत अवश्य कराएं।
आपके सुझावों की प्रतीक्षा में,,,,,,,,,,🌼🌼🌼🌼
आशीष शुक्ल आशु
Emotional poem of human nature
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